Category Archives: Shani Dev Stories ( शनिदेव की कथायें )

रावण की कैद से शनिदेव की मुक्ति – कथा

कथा के अनुसार लंका का राजा रावण एक तपस्वी, महायोद्धा, मायावी था । वह  भगवान शिव का परम भक्त भी था । एक बार उसने तपस्या करके ब्रहमा जी से वरदान प्राप्त किया कि उसकी मृत्यु मानव व वानरों के अतिरिक्त किसी के हाथों न हो। वरदान पाकर वह अहंकारी हो गया अवसर पाकर उसने शनि लोक पर चढ़़ाई कर दी और शनिदेव को महाकाल सहित बंदी बना लिया । उसने दोनों को अपने कारावास में उलटा लटका दिया। वे दोनों अश्रु्धारा बहाते हुए अपने प्रभु शिव का स्मरण करने लगे तब भगवान शिव अपने भक्तों की करुण पुकार सुनकर प्रकट हुए और दोनों को आश्वस्त किया कि वे शीघ्र ही हनुमान के रुप में उनका उद्धार करने आएगें । इ्धर जब रावण का अत्याचार बढ़ने लगा तो भगवान विष्णु ने उसका संहार करने के लिए राम के रुप में और लक्ष्मी ने पृथ्वीपुत्री सीता के रुप में अवतार लिया । कालांतर में जब राम ने अपने पिता की आज्ञा का पालन करने हेतु वनवास लिया तो उनके साथ पृथ्वीपुत्री सीता व अनुज लक्ष्मण वन में रहने लगे ।

एक दिन रावण की बहन शूर्पनखा वहां आई और अपनी राक्षसी माया फैला कर राम- लक्ष्मण को यु़द्ध के लिए प्रेरित किया ।  यु़द्ध में रावण के खर, दुषण व त्रिशिरा जैसे शुरमा मारे गए। बदले की भावना से रावण ने सीता का छल से अपहरण कर लिया और लंका में अशोक वाटिका में छुपाकर रख दिया। उन्हीं दिनों राम- लक्ष्मण की भेंट रुद्रावतार हनुमान से हुई और फिर सीता की खोज शुरु हुई। हनुमान सीता की खोज के लिए समुद्र पार करके लंका में प्रवेश किया और अशोक वाटिका में छुपाकर रखी सीता को खोज निकाला । सीता  से मिलने के बाद हनुमान ने अशोक वाटिका फल खाने लगे और विनाश मचा दिया । हनुमान को रोकने के लिए रावण ने अपने पुत्र अक्षय कुमार को भेजा । लेकिन हनुमान ने अक्षय कुमार को मार डाला । अंत में मेघनाद ने हनुमान को ब्रह्रापाश में जकड़कर रावण के समक्ष उपसिथत कर दिया और रावण ने हनुमान जी की पूंछ में आग लगा दी । हनुमान जी ने अपनी पूंछ से लंका का वि्ध्वंस कर दिया । लेकिन हनुमान जी ने देखा लंका जलने पर भी श्याम वर्ण नहीं हुई । तभी उनकी दॄष्टि रावण के कारावास में उलटे लटके शनिदेव पर पड़ी । तब शनिदेव ने अपनी व्यथा हनुमान जी को सुनाई और रावण ने उनकी शक्ति को भी कीलित कर दिया है।  हनुमान जी ने शनिदेव को मुक्त कर दिया  और उनकी शकित का भी उत्कीलन कर दिया ।  फिर तो हनुमान जी के प्रताप व शनिदेव की दॄष्टि पड़ने पर लंका जल कर राख हो गई।

इसके बाद राम- रावण यु़द्ध में रावण का अपने वंश सहित विनाश हो गया । बाद में हनुमान जी ने महाकाल को भी मुक्त करा दिया। तब शनिदेव हनुमान जी से बोले , “हे महावीर ! मैं आपका सदा ऋणी रहुंगा।” तब हनुमान जी ने शनिदेव दिव्य दॄष्टि प्रदान कर अपने रुद्र रुप के दर्शन कराये। उस समय शनिदेव ने हनुमान जी के चरण पकड़ लिए और प्रेम के अश्रु बहाने लगे। शनिदेव ने हनुमान जी से कहा कि प्रभु मैं आपके भक्तों को कभी भी पीडि़त नहीं करुंगा । जो मनुष्य इस कथा पढ़ेगा या श्रवण करेगा, मैं सदा उसकी रक्षा करुंगा।

 

 

शनिदेव पर तेल चढाने का रह्स्य

 

एक बार शनिदेव खेलते हुए उस स्थान पर जा पहुंचे जहां पर श्री राम भक्त हनुमान तपस्या कर रहे थे। शनिदेव ने उदंडतावश हनुमान जी को युद्ध के लिए ललकारा, परन्तु उन्होनें शनिदेव को कहा, ” हे शनिदेव ! इस समय में अपने प्रभु राम की अराधना कर रहा हूं, आप विघ्न न डालें। “

इस पर शनिदेव ने अहंकारवश प्रभु हनुमान जी से कहा, ” हे वानर ! मैने तो देवताओं से सुन रखा था कि तुम बहुत बलशाली हो।परन्तु मुझे देखकर तुम्हारा बल कहां चला गया ? यदि तुम में बल है तो मुझसे यु़द्ध करो अन्यथा मेरे दास बन जाओ। इस बात पर क्रोधित होकर हनुमान जी ने शनिदेव को अपनी पूंछ में बांध लिया और एक पर्वत से दूसरे पर्वत तक छलांग लगाने लगे। जिससे कि शनिदेव का सारा शरीर पत्थरों की रगड़ से छिल गया। शरीर छिलने से पीडि़त शनिदेव गिड़गिड़ाते हुए हनुमान जी से बोले, Þहे हनुमान जी! अब बस करो और मुझे बंधंन मुक्त कर दो, आज से मैं आपकी हर बात मानूंगा। “

तब हनुमान जी ने शनिदेव से वचन लिया कि आज से जो भक्त मेरी अराधना करेगा उसे तुम कभी भी दुखी नहीं करोगे अपितु आप उनकी रक्षा करोगे। शनिदेव को तेल इसलिए चढ़ाया जाता है कि शनि की पीड़ा दूर हो और वे प्रसन्न होकर कृपा करें।






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