ज्योतिष पर शनि का प्रभाव


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सौरमण्डल का रत्न शनि

सौरमंडल के दूसरे सबसे बड़े व सूर्य से ग्रहों की दूरी के क्रम में छठे स्थान पर आने वाले मंदगति ग्रह शनि का वलय नील किंकिणों का होने के कारण पृथ्वी से देखने पर अन्य ग्रहों की अपेक्षा अधिक चमकीला दिखार्इ देता है। इसलिए इसे सौरमंडल का रत्न कहा जाता है। इसके चारों ओर अनुमानत: सात वलय हैं।

आकार में बृहस्पति ग्रह से कुछ ही लघु शनि ग्रह का वातावरण हाइड्रोजन, हीलियम गैसों से युक्त है। बृहस्पति की भांति ही यह अपने कक्ष का भ्रमण तीव्र गति से करता है।

सूर्य से शनि की दूरी 88 करोड़ 61 लाख मील है। जबकि पृथ्वी से इसकी दूरी लगभग 71 करोड़ 31 लाख 43 हजार मील है। इसका व्यास 1 अरब 42 करोड़ 60 लाख किलोमीटर है। इसके धरातल का तापमान अनुमान: 240 फारेनहाइट है। इसका वनज 75 पृथ्वीयों जितना है।

कहा जाता है कि शनि का धरातल इतना बड़ा है कि इसमें हमारी पृथ्वी  जितने आकार की करीब 700 पृथ्वीयां समा चुकी हैं।यी मील प्रति सेकंड़ की बति से सूर्य का परिभ्रमण 29 वर्ष 5 मास 16 दिन 23 घंटे 15 मिनट में पूर्ण करता है। तबकि अपनी ही धूरी या कक्ष का परिभ्रमण यह 17 घंटे 14 मिनट 24 सेकंड़ में पूर्ण करता है। शनि के अनुमानत: 10 या 15 चंद्रमा हैं, जिनका प्रत्येक व्यास से भी अधिक है।

वैज्ञानिक विश्लेषण

वैज्ञानिकों दुवारा की गर्इ नवीनतम खोजों के अनुसार शनि के धरातल पर सबसे अधिक हाइड्रोजन गैस है, जिसका प्रतिशत 95 है जबकि हीलियम गैस 3 प्रतिशत है। कुछ मात्रा में जल व मीथेन है। इसका घनत्व जल से 0.7 अल्प है। दोनों ही धु्रवों पर यह चपटा है।

खोज के अनुसार शनि के धरातल पर तेज अंधियां चलती हैं, जिनकी गति शनि की मध्य रेखा पर 1800 किलोमीटर प्रति सेकंड़ है। इसका तीसरा वलय कुछ धुंधला है जबकि पहला व दूसरा वलय सर्वाधिक चमकीला व नीलवर्णी है।

पृथ्वी से देखने पर इसके वलय ठोस प्रतीत होते हैं। लेकिन वास्तव में ये कण बिंदुओं द्वारा बने हैं। शनि का भीतरी भाग बृहस्पति के भाग से बहुत मिलता-जुलता है।

वैज्ञानिकों द्वारा की गर्इ खोज के अनुसार शनि ग्रह के 31 उपग्रह हैं। उनमें से 18 को नामाकिंत किया जा चुका है। सूर्य से इसकी दूरी 1 अरब 43 करोड़ किलोमीटर है। इसके धरातल पर दबाव 1.4 वार है जबकि बादलों का तापमान 12 से है।

शनि के वलयों में जन की मात्रा विधमान है। वहां बर्फ भी है। शनि के धरातल पर 12000 कैलिवन तापमान है। आकाश से यह जितनी भी ऊर्जा ग्रहण करता है, विकिरणों द्वारा लौटा देता है।

नपुंसक ग्रह

फलित ज्योतिष में शनि को नपुंसक ग्रह कहा गया है। यह तुला राशि के 20 अंश पर उच्च का व मेष राशि के नीच का होता है 3, 7, 10वें भाव पर इसकी पूर्ण दॄष्टि रहती है। बुध, शुक्र इसके मित्र, बृहस्पति सम व सूर्य, चंद्र, मंगल शत्रु हैं।

इसके नक्षत्र पुष्य, अनुराधा, उतराभाद्रपद हैं।जन्मकाल में इनमें से कोर्इ भी नक्षत्र हो तो जातक का जन्म शनि की महादशा के काल में हुआ जाना जाता है।

शनि की ऋतु शिशिर, रस कसैला, गुण तम, भावकारक मृत्युभाव, शत्रुभाव है। देवता यम, राशि स्वामित्व मकर-कुंभ, धातु लोहा, रत्न नीलम है। यह शुद्रवर्णी, ग्रहों में दास की पदवी से विभूषित है।यह सभी बारह राशियों का भ्रमण 30 सालों में पूरा करता है। इस गणित के अनुसार एक राशि का भ्रमण ढार्इ वर्ष में पूरा करता है। स्थूल मान के अनुसार यह एक नक्षत्र का भोग 400 दिन अर्थात एक वर्ष से अधिक काल तक व नक्षत्र के एक चरण का भोग 100 दिन करता है।

बारह महीनों में से चार माह वक्री व आठ माह मार्गी रहता है।ासूर्य से 15 अंश दूर 38 दिन तक अस्त रहकर यह उदय होता है। उदय होने के 135 दिन तक यह मार्गी रहता है। मार्गी रहने के बाद 105 दिन तक वक्री रहता है। यह अवधि 140 दिन भी हो सकती है।

यह तथ्य है कि शनि वक्री होने से पांच दिन आगे अथवा पीछे सिथर अवस्था में रहता है। सूर्य की राशि से चतुर्थ राशि समाप्त कर वक्री होता है। वक्री होकर 120 अंश चल चुकने पर मार्गी होता है।

शनि सदैव सूर्य से 2, 12 राशि पर द्रुत; 3, 11 पर सम; 4 मंद; 5,6 पर वक्र; 7, 8 पर अतिवक्र; 9,10 पर कुटिल चाल चलता है।

अंक ज्योतिष में शनि

अंक ज्योतिष में अंक 8 का स्वामित्व ग्रहेश्वर शनि को प्राप्त है। जिन जातकों का जन्म किसी भी महीने की 8, 17 व 26 तारीख को होता है, वे शनि प्रधान जातक कहलाते हैं। यदि जातकों का जन्म शनि की अवधि अर्थात 21 दिसम्बर से 26 जनवरी या 27 जनवरी से 19 अथवा 26 फरवरी को हुआ हो तो उन प्रभाव अधिक देखने को मिलता है। इन अवधियों में से 21 दिसंबर से 26 फरवरी अवधि सकारात्मक होती है, जबकि 27 जनवरी से 19 अथवा 26 फरवरी नकारात्मक होती है।

 

 





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