शनिदेव और प्रभु शिव – कथा

 

शनिदेव ने एक बार ब्रह्रामा जी से घोर तप करके वर पा लिया कि वो जिस पर भी दॄष्टिपात कर दें वह विनाश को प्राप्त हो जाए। परन्तु शुभ दॄष्टि डालने से मनुष्य को धन-धान्य की प्रा्प्ति हो। शनिदेव उंद्दड तो थे ही मनोनुकूल वर प्राप्त कर लेने के बाद शनिदेव और भी उंद्दड हो गए यहां तक वह अपने पिता की आज्ञा की भी अवेलना करने लगे। एक बार सूर्यदेव ने अपने पुत्रों को योग्यता अनुसार एक-एक लोक का अधिपत्य प्रदान किया परन्तु शनिदेव इससे संतुष्ट नहीं हुए ।

वे सभी लोकों का अधिपत्य चाहते थे ।  शनिदेव की इस व्यवहार से संतप्त सूर्य ने प्रभु शिव से प्रार्थना की । प्रभु शिव ने सूर्य की प्रार्थना पर शनिदेव को सबक सिखाने के लिए अपने गणों को व नन्दी को शनिदेव से युद्ध करने भेजा परन्तु शनिदेव ने उनको परास्त कर दिया । प्रभु शिव ने गणों को व नन्दी को परास्त जानकर स्वयं शनिदेव से युद्ध करने के लिए पंहुचे। दोनों में घोर संग्राम हुआ ।

शनिदेव ने प्रभु शिव की ओर मारक दॄष्टि डाली तो प्रभु शिव ने भी तीसरा नेत्र खोल दिया । दोंनो के तेज से एक ज्योति निकली जिसने शनिदेव व उनके सभी लोकों को आच्छादित कर दिया । तब प्रभु शिव ने शनिदेव पर त्रिशुल का प्रहार किया । इस तरह प्रभु शिव ने शनिदेव संज्ञाशुन्य कर दिया । परन्तु सूर्यदेव अपने पुत्र शनिदेव को संज्ञाशुन्य देख कर पुत्रमोह से ग्रस्त हो गए।  वे प्रभु शिव से अपने पुत्र शनिदेव की जीवन की भीख मांगने लगे। तब प्रभु शिव ने शनिदेव को संज्ञाशुन्यता से दूर कर दिया और वे उठ बैठे।

इस घटना के बाद प्रभु शिव ने शनिदेव को अपना शिष्य बना लिया और प्रभु शिव ने शनिदेव को प्रंचड पराक्रमी जानकर दंडाधिकारी नियुक्त कर दिया। आज भी शनिदेव धार्मिक प्रवृति के मनुष्य की रक्षा करते हैं और  अधार्मिक प्रवृति के मनुष्य को कठोर दंड देते हैं। तभी कहा गया है कि शनिदेव की महादशा में मनुष्य को धार्मिक प्रवृति को नहीं छोड़ना चाहिए ।









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