शनिदेव जी का स्वरूप


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प्रभु शनिदेव जी का स्वरूप


शनि के स्वरुप का वर्णन करते हुए महर्षि पराशर जी ने बृहत होराशास्त्र में शनि का शरीर दुबला-पतला लेकिन लंबा, नेत्र पिंगलवर्णी दांत मोटे स्वभाव आलसी व शनि के रोम तीखे व कठोर बतलाया है। यह शुद्र वर्णी व तामसी प्रवृति के हैं।

मतस्य पुराण में शनिदेव की कांति को इंद्रमणि जैसा बतलाया है व शनिदेव हाथ में धनुष, त्रिशुल व वरमुद्रा धारण किए हुए लोहनिर्मित रथ पर विराजमान बतलाया है । आचार्य वराह मिहिर रचित बृहत संहिता में शनिदेव को मंदबुद्धि, कृशकाय, नेत्र पिंगलवर्णी, विकृत दांत वात प्रवृति व रुखे बालों वाला ग्रह बतलाया है ।

ग्रहों में शनिदेव को क्रूर, पापीग्रह के रुप में जाना जाता है । जिस पर भी शनिदेव की क्रूर दॄष्टि पड़ जाए उसका विनाश हो जाता है । शनिदेव की दशा का प्रभाव किसी भी जातक पर प्राय: 36 से 45 वर्ष की आयु में अधिक रहता है । शनि की दशा में काले घोड़े की नाल का छल्ला या नौका की कील से बना छल्ला करें । शनि का प्रमुख रत्न नीलम है । नीलम के अभाव में जामुनिया, नीलमा, नीला कटहला भी धारण किया जा सकता है। शनि का स्थायी निवास पशिचम दिशा है वैसे इनके आधिपत्य में सौराष्ट्र प्रदेश, घाटियां, बंजरभूमि, मरुस्थल, भंगनिवास, कोयले की खान, जंगम पर्वत, मलिन स्थल है।

शनिदेव के कारकत्व – आलस्य, हाथी, रोग, विरोध, दासकर्म, काले धान्य, झूठ बोलना, नपुंसकता, चांड़ाल, विकृत अंग, शिशिर ऋतु, लोहा, शल्य विधा, कुत्ता, प्रेत, आग, वायु, वृद्ध, वीर्य, संध्या, अतिक्रोध, स्त्रीपुरक सुख, कारावास, स्नायु, अवैध संतान, यम पूजक, वैश्य, कृषि कर्म, शूद्र, पशिचम दिशा, कंबल, बकरा, रतिकर्म, पुराना तेल, भय, मणि, वनचर, मरण आदि।

शनिदेव के छायासुत, क्रुरलोचन, पंगु, पंगुकाय, यम, सूर्यतनय, कोण, अर्की, असित, अर्कपुत्र, दीर्घ छायात्मज, सौरि, मंद, पांतगी, नील, मृदु, कपिलाक्ष आदि पर्यायवाची नाम है।

शनिदेव की दान योग्य वस्तुएं उड़द, काले जुते, काले चने, काले कपड़े, काली गाय, काले पुष्प, लोहा, तेल, नीलम, गोमेद, जामुन, आदि हैं।

लोहा, तेल, कोयला, चमड़ा, हाथी दांत, ड्राईविंग, बढ़ईगिरी, वकालत, चाय – काफी विक्रय, लिपिक, दलाली, जल्लाद, क्रय-विक्रय, खदान का कार्य, पेंटर, लाटरी, सट्टा, राजनिति, भिक्षावृति आदि शनिदेव से संबंधी व्यवसाय हैं।








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