शनिदेव की विकलांगता

 

मुनि पिपलाद के पिता यमुना किनारे अपने आश्रम मे रहा करते थे काल-क्रमानुसार शनिदेव ने उन्हें विपन व रुग्ण बना दिया । मुनि पिपलाद की माता इस बात से परिचित थी उनके पति की ऐसी दशा शनिदेव के कारण हुई है । उस समय मुनि पिपलाद अबोध बालक ही थे । वयस्क होने पर मुनि पिपलाद ने अपने पिता के बारे में अपनी माता से जाना तो क्रोधित हो गए और शनिदेव से प्रतिशोध लेने के लिए निकल पड़े । एक दिन अनायास ही मुनि को शनिदेव पीपल के पेड़ पर दिखाई दिए तो मुनि ने अपने तपो बल से उत्पन्न ब्रह्रादंड से प्रहार किया । प्रहार से शनिदेव के दोनो पैर टुट गए और पीड़ा से कराहते हुए प्रभु शिव रक्षा की प्रार्थना करने लगे।

अपने शिष्य की करुण वेदना सुनकर वहां प्रकट हुए और मुनि पिपलाद को काल की करालता का प्रबोधन दिया कि, ” शनिदेव आपके पिता की दशा के लिए दोषी नहीं है शनिदेव तो सृष्टि के नियमों का पालन कर रहे है। काल की गति को जानना असंभव है । शनिदेव को दंडाधिकारी का कार्य भार मैंने ही सौंपा है । ”

तब  मुनि पिपलाद ने प्रभु शिव के चरणों में दडवत प्रणाम कर बोले, ” हे प्रभु ! आप शनिदेव से कहें कि वो संसार के निरीह प्राणियों को न सताएं । इनके पैर टुट जाने से अब ये मंदगति देव जाने जाएंगें । इन्हें वचन देना होगा कि जो इस घटना को स्मरण करेगा व मेरे द्वारा स्थापित पिपलेश्वर महादेव की पूजा करेगा उसे शनिदेव कभी प्रताडि़त नहीं करेंगें। ”

शनिदेव ने प्रभु शिव के समक्ष मुनि पिपलाद को वचन की अनुसंसा कर दी। तब प्रभु शिव अंतरध्यान हो गए । आज भी जो मुनि पिपलाद की कथा पढ़कर या श्रवण करता है और शनिवार को पीपल को जल व गुड़ चढ़ाता है, उस पर शनिदेव की कृपा दॄष्टि बनी रहती है।









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