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ज्योतिष विज्ञान

 

भारतीय ज्योतिष के मुलभूत दो पक्ष हैं -

1.    गणित
2.    फलित

सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंग फलित ज्योतिष है। इसी के आधार पर भूत-भविष्य-वर्तमान का निरुपण किया जाता है। ज्योतिष का महत्व फलित से आंका जाता है। फलित ज्योतिष के कई प्रकार आज प्रचलित है। जिनमें -

अंक ज्योतिष
हस्त दर्शन
ललाट रेखा
पाद रेखा
रमल
कर्णपिशाचिनी सिद्धि
यक्षिणी साधना
स्वप्न विवेचना आदि प्रमुख हैं।

इतने पर भी ज्योतिष की नींव गणित पर अधारित है। कार्यालय में ढेर सारी पत्रिकाएं आती हैं जिनमें प्राय: अशुद्धियां पाकर दिल कांप उठता है। न गर्भशोधन, न वेलांतर, न स्थानीक समय, न सही ग्रह स्पष्ट होता है और दोष सारा जाता है, फलादेश कहने वाले ज्योतिषी पर।

नौ ग्रह और अब बारह में से मूलभूत सात ही ग्रह हैं जिनमें सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि का एक अलग व्यकितत्व है। हार, दुख:, कष्ट, हानि का सेहरा शनि पर ही बंधता है।

जहां-जहां पांव पड़े संतन के वहां-वहां बंटवारा” की तरह जिस पर शनि देव की दॄष्टि पड़ गई, फिर वहां कुछ भी हो शेष नहीं रहेगा। भगवान बचाए ऐसी क्रूर दॄष्टि से। भारतीय समाज में कुछ कहावतें शनि को लेकर प्रचलित हैं जैसे -

क्या कहें – व्यापार चौपट है – शनि की कृपा है।
आजकल तो शनि का चक्कर है।
शनि पैरों पर उतर आए हैं।
तू तो शनि बनकर पीछे पड़ गया है।

भारतीय ज्योतिष में गलत धारणा है कि शनि सदैव अहित ही करते हैं। सात ग्रहों में शनि सुमेरु हैं, राहु-केतु छाया ग्रह हैं। तो इसलिए बारह राशियों को सात ग्रहो में बांट दिया है। केवल सूर्य व चंद्रमा एक-एक राशि के स्वामी हैं। वहीं शेष ग्रह दो-दो राशि के स्वामी हैं।









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