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3 घंटे पहले
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- हाल ही में गूगल के सीईओ पिचाई ने बिलियनेयर क्लब में एंट्री ली है। उनकी कुछ प्रेरक बातें, उन्हीं की जुबानी…
जब आप एक इतने बड़े संगठन में प्रोडक्ट और रेवेन्यू मॉडल को बदलने की कोशिश करते हैं, तो एक लीडर के तौर पर आपके सामने टेंशन आना स्वाभाविक है। अभी तेजी से आगे बढ़ने का वक्त है। मुझे लगता है कि जब बदलाव के पल आते हैं, तो अच्छी बात ये होती है कि आपके पास सोचने का वक्त नहीं होता। मेरे लिए सबसे बड़ा फोकस ये है कि हमारी टीम काम को सही ढंग से अंजाम दे रही है या नहीं। क्या हम आगे बढ़ रहे हैं? क्या हम इनोवेशन कर रहे हैं? मेरी टीम ने इस दिशा में अच्छा प्रदर्शन किया है और रफ्तार को बनाए हुए है, तो मुझे ज्यादा चिंता नहीं होती है।
कर्मचारियों में निवेश करना और उन्हें सशक्त बनाना जरूरी है। कई बार जो सुविधाएं (जैसे फ्री लंच) दी जाती हैं, उनका मकसद ये नहीं होता कि लोगों को खाना देना है, बल्कि एक ऐसा माहौल बनाना होता है जो सकारात्मक हो, आशावादी हो और जहां इनोवेशन को बढ़ावा मिले। लंच के दौरान लोग एक साथ बैठते हैं, बातचीत करते हैं, नए विचारों पर चर्चा होती है। अलग विभागों के लोग आपस में मिलते हैं, नए आइडिया बनते हैं… तो यही सब उस सुविधा के पीछे की सोच है। आज भी मुझे लगता है कि हमारी कंपनी के हर स्तर पर इनोवेशन हो रहा है। लोग सुबह उठते हैं और सोचते हैं- मैं ये नया काम कर सकता हूं। तो कर्मचारियों को सशक्त बनाना, उन्हें आजादी देना, ये हमेशा से गूगल की ताकत रही है और आगे भी रहेगी।
इसका मतलब ये नहीं कि नेतृत्व का कोई रोल नहीं है। जरूरी है कि हम संतुलन बनाए रखें। एक तरफ कर्मचारियों को आजादी दें, तो दूसरी तरफ मजबूत लीडरशिप भी हो। जब आप लोगों को खुलकर बोलने की आजादी देते हैं, तो अलग-अलग आवाजें सुनते हैं। कभी ऐसा होता है कि 500 लोग कुछ बोलते हैं, लेकिन उससे पूरी कंपनी का नजरिया नहीं झलकता। हम लोगों को इसलिए सशक्त बनाते हैं ताकि वो कंपनी के मिशन को पूरा करने में अपना योगदान दें। जब कंपनी बहुत तेजी से बढ़ती है और हजारों नए लोग जुड़ते हैं, आप मान लेते हैं कि सबको कंपनी की बुनियादी बातें पता हैं। लेकिन फिर आपको एहसास होता है कि इन बातों को बार-बार दोहराना जरूरी है कि हर कोई उन्हें अपना सके। इस तरह का माहौल बनाना आसान नहीं होता, उसके लिए मेहनत करनी पड़ती है। अगर कंपनी के किसी हिस्से में वो ऊर्जा नहीं है, तो हमें देखना होता है कि वहां क्या बदलाव करने की जरूरत है। कार्य-संस्कृति ऐसी चीज है जिसे बार-बार सुधारते रहना पड़ता है, ताकि वो आपके मूल्यों के अनुरूप बनी रहे। इसी वजह से कभी चीजें रास्ते से थोड़ा हट जाती हैं। तो फिर मेहनत करके उसे वापस सही दिशा में लाना होता है।
जैसे-जैसे तकनीक बेहतर होगी, चीजें सहज होंगी मुझे लगता है कि अभी तक कंप्यूटर के साथ इंसानों को ही खुद को ढालना पड़ा है और हमेशा ऐसा ही होता आया है। धीरे-धीरे चीजें इस दिशा में बढ़ रही हैं कि इंसानों को कम मेहनत करनी पड़े, कम एडजस्टमेंट करना पड़ें और कंप्यूटर खुद आपके लिए काम करने लगे। यही असली लक्ष्य है। जैसे-जैसे तकनीक बेहतर होगी, चीजें और सहज होंगी। ऐसा लगेगा कि टेक्नोलॉजी आसपास ही मौजूद है और चुपचाप आपके लिए काम कर रही है। विकास की दिशा यहीं जा रही है।
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